शिव के पांच मुखों में तत्त्व शक्ति विज्ञान के सिद्धांत!

आज बात करते हैं शिव के पांच स्वरूपों की – शिव पांच मुखों के रूप में माने गए हैं। शास्त्रों की ओर देखें तो भगवान वेद व्यास द्वारा रचित महाशिव पुराण की शतरुद्र संहिता का आधार लेकर सूत जी ने शिव के मुख्य पांच स्वरूपों का ही वर्णन किया था। हमारी (कश्मीर) शैवआगम (कुल, समय व मिश्र), वाम व दक्षिण परम्पराओं के अनुसार शिव भी इस सृष्टि को संयमन करने में शिव स्वयं अपनी ही शक्ति के रूप में कुल पांच तरह से कार्य करते हैं जिनमें सृजन, पोषण, संहार, अनुग्रह, निग्रह, गोपन आदि हैं। वैसे तो हर देवता ही पांच शक्तियों का घनीकृत विग्रह है तो सिद्धांततः शिव क्यों नहीं?

शिव के इन पांच मुखों के नाम हैं – ईशान, तत्पुरुष, सद्योजात, अघोर एवं  वामदेव। आप में से जो आचार्य जी के शिव-सूत्र व सौंदर्य लहरी पर प्रवचन नियमित रूप से श्रवण कर रहे हैं वे इन्हे सत-चित-इच्छा-ज्ञान-क्रिया आदि से भी जोड़कर देख सकते हैं। तत्त्व-शक्ति विज्ञान के सिद्धांतों के साथ यदि हम इन्हे संयुक्त करके देखें तो ये स्वरुप पञ्च-महाभूतों व पांच-चक्रों से भी सम्बंधित हैं। कैसे?

एक-एक स्वरुप के बारे में संक्षिप्त चर्चा करते हैं।

सद्योजात (इच्छा)

शिव का यह स्वरूप इच्छा शक्ति से सम्बंधित है। यह विग्रह बड़ा ही विचित्र है क्यों कि शिव अपने इस स्वरूप में  खिन्न और प्रसन्न, दोनों ही मुद्राओं में प्रतीत होते हैं। यह स्वाभाविक ही है, इच्छापूर्ति प्रसन्नता और इच्छा का अपूर्ण रह जाना खिन्नता या दुःख का कारण बनता है। कहते हैं कि शिव के इस स्वरूप में उनके भीतर की क्रोधाग्नि को बाहर निकालने की सामर्थ्य है। जैसा मैं आप सभी को कहता हूँ कि इच्छा के पूर्ण न होने पर पहले तो दुःख परन्तु अत्यंत अल्पकाल में क्रोध में परिणित हो जाता है। अतः इस स्वरुप में उनके अंदर क्रोध को प्रकट करने की संभावना छिपी हुई है जो समय पर प्रकट भी होती है। पांच मुखों वाले शिवलिंग या विग्रह में इस मुख से शिव पश्चिम दिशा की ओर देखते हैं। पश्चिम अर्थात सूर्य-ज्योति, प्रकाश से विपरीत।

कुछ शास्त्र कहते हैं जब ब्रह्माजी सृष्टि की रचना में  प्रवृत्त होने को थे तब शिव ने उन्हें अपना आशीर्वाद इसी रूप में प्रदान किया था। कोई कोई शिव के इस स्वरुप को श्वेत वर्ण में कल्पित करते हैं। इसका कोई बड़ा अर्थ नहीं हैं सिवाय इसके कि मणिपुर चक्र – जो कि इच्छाओं के केंद्र है सभी रंगों की मणियों से परिपूरित है और उनके सम्मिलित प्रकाश में श्वेत वर्ण का आभास होता है। यहां हम अपने भीतरी अहम और क्रोध की पुष्टि करते हैं। शिव के इस श्वेत स्वरूप का संबंध मणिपुर चक्र से है।

वामदेव

शिव का अगला स्वरूप वामदेव, क्रिया-शक्ति प्रधान पंचमुखी शिवलिंग के दाहिनी ओर का यह शिवमुख उत्तरी दिशा की ओर देखता है। यह संरक्षण-पालन से सम्बद्ध है। कवित्व, दया और पालन से युक्त शिव अपने इस स्वरूप में कवि-नट व लोक-रंजक हैं।

अनाहत चक्र में वायु तत्त्व से जुड़े शिव के इस स्वरूप का रंग लाल भी कहा गया है। उनका यह मुख, माया व श्रृंगार-सौंदर्य से जुड़ा है। कुछ ग्रन्थ कहते हैं कि भगवान वामदेव दुखों और पीड़ाओं से भी मुक्त करते हैं। माया शक्ति के चंगुल में फंसे अज्ञानी जीवों को सुख, अर्थ-कामादि प्राप्ति व रोग-दुःख-जरा-व्याधि के निवारण की इच्छाएं यदि पूर्ण होती रहें तो यही उनके लिए मोक्ष-तुल्य होता है। वामदेव स्वरुप उन्हें माया के संसार में माया के नियमों का पालन करते हुए उनके नित्य कष्टों से जीवों रक्षित करता है.

अघोर

शिव का यह मुख दक्षिण की ओर देखता हुआ ज्ञान शक्ति का प्राधान्य रखता है। शिव का यह स्वरूप स्वाधिष्ठान चक्र, जल-तत्त्व में व्याप्त तथा प्राणमय-कोष का नियंत्रक है। तत्त्वों के रंगों से अलग शिव यहां धूम्र वर्ण में अपनी रूद्र- शक्ति को प्रकट करते हैं। अहंकार के संयमन एवं प्राण-जनित सूक्ष्म व्याधिओं व बाधाओं के निवारण में तत्पर शिव अत्यंत सहज, सरल व पवित्र मनोभावों के स्वामी है।

जीवन में अत्यंत सरलता यदि प्राप्त हो जाये, समस्त कुटिलता, स्वार्थ एवं इच्छा-विशेष का त्याग हो सके अर्थात परम-वैराग्य सिद्ध हो तभी पूर्ण-ज्ञान की प्राप्ति होती है। ह्रदय की सरलता ही सबसे कठिन है। केवल वैराग्य ही इसमें सहायक है। इसी परम वैराग्य की सिद्धि हेतु १४ वर्षों का अखण्ड श्मशान वास कई अघोर गुरु निश्चित करते हैं।

तत्पुरुष

यह शिव-मुख पूर्व दिशा की ओर देखता हुआ परमात्म-शक्ति का ही प्रतीक हैं। यहाँ शिव का यह स्वरूप अनंत-प्रकाश युक्त, आनंद शक्ति से लसित आत्म तत्त्व के मूल स्थान अर्थात मूलाधार चक्र को भी प्रदर्शित करते हैं। आत्मा के अणु स्वरुप, सुनहरे पीले रंग के इस शिव मुख का संबंध पृथ्वी तत्त्व से भी है। जीवन की स्थिरता, एकाग्रता एवं विचारों की उच्छृंखलता से मुक्ति हेतु शिव के इस मुख पर ध्यान अर्थात पूर्व दिशा में उदित होते शिव-प्रकाश के प्रतिनिधि सूर्य देवता पर भी ध्यान इंगित है। विद्यार्थियों के ज्ञान-विज्ञान, अपरा-तथा परा-विद्या में इच्छुक साधकों एवं विद्या से ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए भी आप को शिव का यह स्वरुप प्रिय होना ही चाहिए।

ईशान

यहाँ क्षैतिज प्रपञ्च व लौकिक विस्तार में व्याप्त होते हुए उससे सर्वथा भिन्न शिव अपने इस मुख से ऊपर की आकाश की ओर देख रहे हैं। यह स्वरुप आनंदमय कोष व विशुद्ध चक्र में स्थित इस ब्रह्माण्ड की चेतना जिस आकाश तत्त्व से उदित हुई है, जिसे वैज्ञानिक अभी तक एक निर्वात या खाली-स्थान मानते थे, अपने इस स्वरूप में शिव उसी अनवरत उसी आकाश की ओर देखते हैं जिसमे और जिससे इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का उदय, स्थिति तथा विलय होता है। शिव का ईशान मुख वह सदाशिव है, जो ब्रह्माण्ड के हर अणु, हर दिशा, व हर प्राणी व वस्तु में सत के रूप में विद्यमान हैं तथा उससे परे भी है।

शिवोहम!

माँ शक्ति देवप्रिया

"हमारे जीवन के मूल में इच्छा है। सामान्य व्यक्ति को ऐसा प्रतीत होता है कि 
क्रिया करने के लिए इच्छा एक परम आवश्यकता है। इच्छाओं की पूर्ति की दिशा 
में किये गए प्रयत्न एवं कर्म में एक अधूरापन हमेशा छूट जाता है। कुछ भी कर 
लो, कुछ भी प्राप्त हो जाये अंतर में एक आग जलती ही रहती है। शिव की सृष्टि 
बिलकुल अलग है - वहां इच्छा तो है परन्तु वह असीमित आनंद की अभिव्यक्ति 
है। क्रिया है परन्तु कोई उद्देश्य नहीं। उद्देश्य है आनंद का उत्सव न कि अभीप्सा 
की जलन।"

(आचार्य अज्ञातदर्शन आनंद नाथ जी की सौंदर्य लहरी पर चर्चा से उद्धृत)
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क्या आप अपने ध्यान के अनुभव हमसे बांट के हमें कृतार्थ करेंगे?

शिवोहम!

प्रिय स्वाति,

ऐसा प्रश्न मेरे देखे तीन प्रकार के लोग करते हैं –

१. एक तो वो जो ध्यान करने के बारे में मन बना रहे हैं और दूसरों के मन-लुभावन, चमत्कारिक अनुभवों को सुनकर (कम से कम वो तो ऐसा ही सोचते हैं) उनका ध्यान करने का विचार पक्का होगा।

२. वो लोग जो अभी ध्यान कर रहे हैं और उन्हें कुछ अनुभव नहीं प्राप्त हो रहे या अनुभवों की तड़ित-प्रभा ने उनकी चेतना और प्राणों को अभी तक पूर्ण-रूपेण झंकृत व आलोकित नहीं किया है।

३. ऐसे लोग जो प्रश्न पूछकर अपनी अभिरुचि को सार्वजनिक कर अपने आध्यात्मिक होने का, या अपनी विद्वत्ता का प्रदर्शन करना चाहते हैं

बिना इस बात को जाने ही कि आप किस मनःस्थिति में इस प्रश्न को कर रही हैं, मैं इन तीनो प्रकार के लोगों के लिए उत्तर देने का प्रयास करता हूँ, जिससे कि आप अपने संदर्भित उत्तर से वञ्चित न रह जाएं।

यदि आप पहले बिन्दु में वर्णित गुणधर्मों से संबद्ध है तो सुनिए मेरा उत्तर –

आप ध्यान का सही अर्थ समझें और फिर अपना मन बनायें न कि उन चमत्कारिक अनुभवों (जैसे प्रकाश का दर्शन, दिव्य सुगन्ध की प्राप्ति, शरीर का अनिर्वचनीय कम्प, अन्तः-प्रेरणा से भौतिक जगत के सम्बन्ध उत्पन्न ज्ञान, सम्भोग के चरम सा अनवरत आनंद आदि) को लक्ष्य बनाएं जिन्हे अल्प-ध्यानी जन कदाचितपाकर गदगद हो उठते हैं और फिर पुनः-पुनः उन्ही अनुभवों की पुनरावृत्ति के लिए सम्पूर्ण जीवन खपा देते हैं। सभी श्रेष्ठ गुरुजन कहते हैं कि बीच के सारे चमत्कारिक अनुभव तुच्छ एवं सारहीन हैं तथा ध्यान का अंतिम एवं परम लक्ष्य है – अपने सच्चे स्वरुप का अनुभव। इस अनुभव के उपरान्त कुछ विशेष घटनाएं होती हैं, उनमे से मुख्य ( दो-तीन ) मैं बता देता हूँ – पहलातो यह होता है कि मृत्यु का भय जाता रहता है, दूसरा ईर्ष्या, क्रोध, अहंकार एवं कामादि आपको गहराई से नहीं छू पाते। तीसरा – ऐसा व्यक्ति क्षुब्ध नहीं होता अर्थात हानि-लाभ, जय-पराजय, निन्दा-स्तुति, यश-अपयश आदि में वह भीतर सम (आनन्द) रहता है

तो अर्थ यह निकला कि यदि आप ध्यान के प्रति आकृष्ट हुई हैं तो कृपया इन तुच्छ अनुभवों के लिए तो इसे बिलकुल न करें।

यदि आप दूसरे बिन्दु से सम्बंधित हैं तो फिर आप के लिए मेरा उत्तर अलग होगा। कुछ इस प्रकार –

एक ध्यान एवं साधना आदि करनेवाले साधक/साधिका को अपने अनुभव किसी से भी साझा नहीं करने चाहिए। ऐसा मैं नहीं कह रहा वरन समस्त गुरुमण्डल का यही कथन है। एक और मनोवैज्ञानिक बात भी है, यदि कोई साधक/साधिका दूसरों से उसके ध्यान का अनुभव सुनने की लालसा लेकर बैठा हो (हालांकि यह आकांक्षा करना नियमों के विरुद्ध है) और मान लें कि उसे किसी ने (परम्परा एवं गुरु-प्रदत्त नियमों को ताक पर रख कर) अपने अनुभव बता भी दिए तो अब जिसने उत्तर सुना उसकी साधना में सब कुछ उलट-पलट हो जाने वाला है। क्यों? वह इसलिए, कि अब वह भी उन्हीं अनुभवों को अपने ध्यान में उतारने का प्रयास करने में लग जायेगा और ध्यान का एक नियम है – अनुभव के लिए ध्यान नहीं किया जाता वरन ध्यान करने में अनुभव होते हैं।

तो अर्थ यह निकला कि यदि आप ध्यान कर रही हैं तो अपने गुरु से बातचीत करें उनसे अपनी समस्या / अनुभव / या जो भी कुछ आप चाहें बतलायें और उनके बताये मार्ग पर चलकर अपना कल्याण करें।

अब अंतिम अर्थात तीसरे बिंदु से सम्बंधित उत्तर

आप मुझसे मेरे ध्यान के अनुभव इसलिए पूछ रहे/रही हैं कि लोगों को (और quora को भी) पता चले कि आप बहुत अच्छे प्रश्न कर सकते/सकती हैं तो सुनिए – क्षमा करें! आप शायद इस तथ्य को अनदेखा कर रहे/रही हैं कि किसी भी अनुभव को शब्दों में कहा नहीं जा सकता। मुझे बहुत अनुभव हुए, चूंकि मैं ध्यान करता हूँ, साधना करता हूँ। आप भी ध्यान-साधना में उतरिये और स्वयं अनुभव कीजिये।

जय अम्बे श्री!

-आचार्य अज्ञातदर्शन आनंदनाथ

Quora पर दिए गए उत्तर से

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Is there any simple Sattvik tantra, which is not harmful, that I can practice?

Shivoham!

You are asking this question with a fixated view that most of the tantric practices are surely ‘harmful’. So let me first bust this myth around Tantra. Tantra means system of things, functions and way of organizing some elements in a meaningful way that serves a purpose (good or bad is a relative term). If you are from India, USA or any other democratic country you would know what ‘democracy’ it is termed as – Loka-tantra. In the same way our body has many systems such as digestive system, nervous system, skeletal system and you would be amazed to know what these systems are called in Hindi (Sanskrit being the root of it) respectively – Paachan-Tantra, Snaayu-Tantra, Kankaal-Tantra. So you can drop the fear about this word – Tantra. Now we can talk about the Tantra (that you are referring to here).

Tantra is a practical, esoteric system of managing inner and outer energies with a final goal of experiencing the union of Shiva (Existence) – Shakti (Consciousness). Now this system requires a practitioner to follow a way of life, modulate his/her everyday conduct to conserve one’s energies, attain stillness of body-mind while focusing on increasing one’s capacity to be able to resonate one’s inner energies in unison with elements of cosmic-matrix. For this there are innumerable practices and practical systems laid out by ancient Tantra Masters and adepts. Some great authorities on Tantra have commented that there are more than 64 Systems of Tantra.

Whatever the number of Tantric systems be, once you follow a system of Tantra under the guidance of a Master, gradually you get proficient in modulating your individual vibrations with the cosmic patterns. The processes use body, breath, sound, light, power of constellations, Sun, Moon, Fire, Vortices of energies on this planet, intention, mantras, articles, herbs, gems, medicines, sexual energies and yogic practices etc. that are handed out to the student by teacher. The words of teacher are the final authority in Tantra. so by consistently following the instructions of your teacher with faith and devotion there comes a time you can then transcend your limited being. The individual capacities then do not remain limited to the capacities of your sense-organs, individual mind, intellect or power of knowing. Such a perfected practitioner of Tantra becomes far more capable of influencing this visible-perceptible Tattvic-Matrix of elements thus can perform deeds which defy (seemingly so because even these deeds follow certain cosmic laws) the laws of causality (cause-effect).

Now to your question Is there any Sattvic Tantra– No tantra is Sattvik, Rajasik or Tamasik, it is your intent that makes it Sattvik or Tamasik. For example is an electricity generator Sattvic or Tamasik? Well, it depends on how you intend to use it – You can use the available electrical energy to irrigate a field, warm a house, run a ventilator, run a MRI scanner and you can also use it to electrocute a person to death. I would prefer to stick to this example to answer your next question as well.

You subtly ask – Is tantra harmful or dangerous to engage in? Now, tell me if it is dangerous or harmful to build, keep and run an electricity Generator? The answer is – In itself it is not but you must follow the rules and instruction manual, listen to expert’s advice on anything you use so that your own mistake do not harm you.

You ask – Which practice I can do? There are many practices to begin with however before any Tantric Sadhana you must strive to attain 5 things – Nadi Shuddhi, Tattva Shuddhi, Indriya Shuddhi, Mana Shuddhi & Atma Shuddhi.

If you don’t understand what are these cryptic terms and how to do it find a teacher who can guide you in this direction. Never! Never try to attempt any practice on your own without being instructed by a Tantra Master. Thank you for your patience for reading it till the end..

Jai Ambe Shri!

-Acharya Agyaatadarshan Anand Nath

A reply on Quora by Master AD

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प्राणायाम करने का सही क्रम क्या है? सबसे पहले किस प्राणायाम से शुरू करें?

आचार्य अज्ञातदर्शन आनंद नाथ, योग-तन्त्र आचार्य, संस्थापक – द शक्ति मल्टीवर्सिटी

जवाब दिया गया: अभी-अभी

शिवोहम!

प्रिय बन्धुवर,

आपने यदि यह प्रश्न पूछा है तो अवश्य ही आप योग के प्रथम तीन सोपानों (यम, नियम, आसन) को पर्याप्त समय देते हुए उनमे सिद्धहस्त या कम से कम कुछ सफलता प्राप्त हो चुके होंगे, ऐसी आशा करता हूँ। परन्तु यदि ऐसा नहीं किया है तो योग-शास्त्रों में संकलित ऋषियों एवं योगियों के वचनों अनुसार अभी आप प्राणायाम के अभ्यास की अर्हता से वंचित हैं।

मुझे आश्चर्य होता है कि ऐसे लोग जो योग-विज्ञान में एमo एo की उपाधि से सज्ज हैं वो यह कह रहे हैं कि “योग का अभ्यास त्वरा से मन्दता की ओर होता है’ यह तो अति ही हो गई। भगवान पतञ्जलि के योग-दर्शन का मुख्य उद्देश्य ही जब स्वभाव से स्वरुप में ‘स्थिति’ का है और पहले ही सूत्र में चित्त की वृत्तियों की गति के निरोध को योग का लक्ष्य बताया गया है तो जानबूझ कर गतिशीलता में क्यों अपने मन एवं शरीर को झोंकने का प्रयास करने की सलाह दी जाये। और हाँ, प्राणायाम से पहले का सोपान क्या है? उत्तर है – आसन। चलिए अब इसकी भी समीक्षा करें। आसन के बारे में महर्षि कहते हैं “स्थिर सुखं आसन” अरे! ये क्या? यहाँ भी स्थिरता की बात, गति की नहीं!

अब बात करते हैं उन महानुभावों और योगिनियों की जो कह रहे हैं कि आप भस्त्रिका प्राणायाम से प्रारम्भ करें, फिर ये करें फिर वो करें आदि-आदि… देवीयों (योगिनियों) एवं सज्जनो (योगियो) ! आप किस योग-शास्त्र या ग्रन्थ में वर्णित क्रम के बारे में कह रहे हैं? मुझे अवश्य ही बताएँ क्यूंकि मैं योग-तन्त्र का वह शिक्षक (आचार्य) हूँ जो अनवरत सीखने की उत्कण्ठा रखता हूँ। परन्तु मेरे अपने गुरु-परम्परा के प्रचलित अभ्यास एवं किसी प्रामाणिक ग्रन्थ (मेरे पढ़े हुए) में ऐसा कोई क्रम (कि आप भस्त्रिका से शुरू करें आदि-आदि) प्राप्त नहीं हुआ है वरन यह सूत्र अवश्य कहा गया है कि किसी भी प्राणायाम को आप न करें यदि आपकी नाड़ी-शुद्धि नहीं हुई है। परन्तु आप ऐसे तो यह तथ्य मानेगे नहीं तो एक श्लोक का उद्धरण भी दे देता हूँ। आशा करता हूँ योग-शास्त्र की मौलिक भाषा (संस्कृत) का थोड़ा-बहुत ज्ञान आपको होगा ही। तो पढ़िए –

सामवेद की योगचूड़ामणि उपनिषद में वर्णित प्राणायाम साधना के पूर्व की तैयारी की अनिवार्यता के सम्बन्ध में यह श्लोक।

श्लोक कहता है –

यमश्चैव नियमश्चैव, आसनेश्च सुसंयतः |
नाडीशुद्धिम् च कृत्वादौ, प्राणायामं समाचरेत् ||

इस अर्थ यह है – एक साधक सर्वप्रथम यम-नियम पारायण करके आसन में स्थिरता प्राप्त करे। तत्पश्चात नाड़ी-शुद्धि को पूर्ण करके ही किसी भी प्राणायाम का अभ्यास प्रारम्भ करे।

इसका अर्थ क्या निकला? इसका अर्थ यह हुआ कि यदि आपने अब आसन-सिद्धि (एक प्रहर अवधि) तक अपनी यात्रा कर ली है तो अब अपनी नाड़ी-शुद्धि का संकल्प लीजिये और इसमें तब तक लगे रहिये जब तक नाड़ी-शुद्धि के लक्षण आपमें प्रकट न होने लगें। नाड़ी-शुद्धि के लक्षण क्या हैं? इसका उत्तर भी उन्ही शास्त्रों में वर्णित है जिसके ज्ञान का प्रयोग (गलत-सही) कर के दुनिया भर में लाखों की संख्या में सर्टिफाइड योगा-टीचर्स (क्षमा करें उनके लिए मैँ योगाचार्य शब्द का प्रयोग नहीं कर पा रहा हूँ) लोगों के कब्ज़, रक्त-चाप, मधुमेह, घुटने और पीठ के दर्द आदि का इलाज करके करोड़ों कमाने की होड़ में लगे हुए हैं। कोई ही विरला कदाचित ‘चित्त-वृत्ति निरोध’ के लिए योग का प्रचार व साधन करता है। फिर भी यही आपको शास्त्रों में नाड़ी-शुद्धि के लक्षण खोजने का श्रम नहीं करना है तो आप मुझसे व्यक्तिगत रूप से पूछ सकते हैं।

चलिए प्रश्न पर वापस आते हैं। तो यह शास्त्र-सिद्ध वचन है कि नाड़ी-शुद्धि पूर्ण किये बिना कोई भी अन्य प्राणायाम नहीं करना चाहिए और आप पूछेंगे कि यदि शास्त्र के इस आदेश का पालन नहीं किया गया, तो ?

इस पर योग के सभी प्रामाणिक शास्त्र (पुनः शास्त्र पढ़िए) कहते हैं –

हिक्का कासस्तथा श्वासः, शिरोकर्णाक्षि वेदना |
भवन्ति विविधा रोगाः, पवनस्य व्युत्क्रमात ||

अर्थ है – हिचकी, खांसी, दमा, शिर, कान एवं आँख की वेदना (पीड़ा) एवं विभिन्न प्रकार के रोग वायु के व्यतिक्रम से उत्पन्न हो जाते हैं।

एक शिक्षक का कर्त्तव्य है कि वह अपनी क्षमता एवं ज्ञान के अनुसार शास्त्रोक्त ज्ञान का पारायण एवं प्रसार करे सो यह तो मैंने कर दिया। अब आप पहले कपालभाति करें, भस्त्रिका करें या कुछ भी – मैं या जानता हूँ कि इस ज्ञान को स्मरण रखते हुए भी आप अपने व्यक्तिगत निर्णय लेने के लिए स्वतन्त्र हैं।

शिवोहम!

Agyaatarashan Anand Nath

आचार्य श्री अज्ञातदर्शन आनंद नाथ जी के quora पर दिए गए उत्तर से !

Shakti Multiversity

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The Gita: Srimad Bhagwadgita: श्रीमद्भगवद्गीता : Chapter 2:30

I, Acharya Agyaatadarshan Anand Nath sa-shaktikaayai bow down at the lotus feet of my first Guru, my revered father Pandit Shri Murli Dhar ji Mishr,  Vidya Guru Kaul Shiromani Shri Shivanand Nath ji, Yoga Guru Paramhamsa Shri Balendu Giri ji Maharaj, Tantra Guru Shri Shri Anta Devji Maharaj, Vama Guru Shri Kaleshwaranand Ji Maharaj and all the compassionate Masters, divine souls of Gurumandala..  I pray for their love, support and guidance always..

Shivoham!

देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत |
तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि || 30||

dehI nityam avadhyo ayam dehe sarvasya bhArata
tasmAt sarvaNi bhutAni na tvam shochitum arhasi || 29 ||

dehI—the entity (soul) that dwells within the body; nityam—always, continuous; avadhyaḥ— can’t be killed, immortal; ayam—this (soul); dehe—in the body; sarvasya—of everyone; bhArata—descendant of Bharat, Arjun; tasmAt—therefore; sarvANi—for all; bhUtAni—living entities; na—not; tvam—you; Shochitum—mourn, think; arhasi—should

TranslationO descendant of Bharat, Arjun, the soul that dwells within the body is immortal; therefore, you should not mourn for anyone.

Here, the style of Krishna is little preliminary wherein he is teaching his student by reiterating the same principle in different ways. He is re-emphasizing the key points by repeating them over so that Arjuna does not miss it, in case he was not able to pay attention earlier. It is clearly Masters compassion wherein he is considering the mental and emotional state of the student. Once again he is seemingly repeating the principle of continuity of atmam by calling it dehee – the one who lives in deha (body). He says “This entity (you) and those (others) whom you are going to fight with are not the bodies that you see instead there is this all pervading atman expressing through each of them. And he says this atman is a continuous presence in time-space and beyond, it is ever-existing, can not be killed and is common to everybody (sarvaani bhUtaani). Although as per saamkhya philosophy it should be translated as ‘in each body’. Which would mean one soul per body albeit no changes are to be assumed in the intrinsic quality of soul’s immortality. Whether there be one soul in every body (Vedanta) or one soul per body (Samkhya) it doesn’t allow us to grieve for death of physical body because soul is never annihilated.

You don’t have to believe in Krishna’s words instead analyze your own experiences. None of us is ever had the feeling of being absent (non-existence), even in deep sleep (though upon coming to waking state) recognize our continuity (presence). Otherwise how can we declare ‘I got a very good sleep’. Further none of us has ever had the experience of birth (being born). To our experience it is as if we are present here since eternity (not ‘as if’ we indeed are present here since eternity – we are a beginning-less existence). And none of us has ever had the experience of ‘death’ (non-existence) then what stops us from concluding that we ARE a continuum beyond the body (matter). I should be kidding if I said that this recognition was as easy as stated. It requires a lot of efforts (prayatn saadhakah) on our part to become liberated.

Kaivalya is the name given to the ultimate liberation that a soul can achieve. Kaivalya is reached with Purusha (soul) is able to liberate itself (through proper knowledge) from the clutches of prakriti (primordial force of creation/nature or matter). But an immediate question comes how does purusha gets imprisoned by prakriti. In shaivism it is explained that it all begins with – kama , desire or ichchaa. It is our ichchha (desire) which begins this cycle of creation and then its expansion becomes overwhelming and binding (though this act of getting imprisoned and forgetfulness too has been taken as Shiva’s freedom) upon shiva (the equivalent to Purusha). The jeeva (Nara as per Trika) becomes entangled in this bhava saagar due to this seed of desire (kama or ichchhaa). It is also said that a sadhaka must therefore contemplate over the very nature of knowledge that creates the bondage and suffering of this bhava saagar. Although we have to transcend this faculty of ‘intelligence’ as well yet to begin with we have to begin living intelligently. ‘Intelligent living’ – though a baby-step yet by all means the very first and unavoidable step, towards the ultimate freedom from the sufferings of bhava saagar.

As a child I had come across a book on Bhagwatgita (from Babuji’s personal library of course!) which had some beautiful pictures in the beginning of the text. An image that shook me to the core and gotten permanently etched was of a frightening deep ocean, full of storms, giant-whirlpools and huge violent creatures swallowing every entity that was afloat on its surface. There were men women, children drowning and crying for help. It also depicted a golden boat on which Shri Hari (Narayan Vishnu) was seen rescuing some of these people from drowning. For very long time, till my spiritual journey started whenever this word ‘bhava sagar’ was uttered ‘this’ image used to flash in my mind-space and despite all the horror depicted in that image I particularly focused on the assuring sight of ‘Satchidaanand Shri Hari’ extending his hands to those who were calling out for help. For many years this understanding was real for me and I did think that those who call out to Shri Hari are definitely helped by Him but soon after I was introduced to the concepts of Atma, Brahm, Maya, Manas, Shakti, Karma, Shiva, Ahamkaara etc. I started questioning the content of this image especially the presence and motive of this external rescuer Shri Hari. My limited childish objection to the rescuer’s conduct was – if He is the father of everyone why is he discriminating? Why is he expecting His own children to worship Him and sing His glory to be able to become worthy of such help? He should help everyone of them – alike without any discrimination for He loves them all.

Well.. as I said it was ‘childish’ objection because now I clearly understand what ‘bhava’ really means. In Sanskrit language this word bhava means to ‘become’. And if you contemplate deeply on your own motivations of life you would see – all the suffering arises out of our desire to ‘become’ someone else than we already are. This terrifying ocean is symbolic of kaala or death that is seen as gulping away all that is, over a period of time. ‘Becoming’ is always in future – ‘Being’ is here. Becoming is offshoot of kala (Time) and it is bound to eat up the ‘Being’ (Timeless). We, as all-pervading unlimited consciousness that was beyond birth and death were plagued with the idea/desire (ichchhaa) of becoming (bhava) a man or a woman or someone (limited). We became that and ever since then we are never satisfied (due to our association with this mortal and limited identity of body) in ‘being’ rather continuously trying to ‘become’. Our becoming may have different hues – good or bad, noble or corrupt, rich or poor, happy or unhappy, powerful or poor but we are continuously struggling only to be eaten up by the oceanic time. But the reality is we are always (Sat) cognizant/aware (chit) of the bliss (Ananda) that we truly are. Only we need to seek (become aware of/ have a calling for) the refuge in our own true self. This ocean of time affects (consumes) those who become prey to it by being led by the desires (kabir) of engagement in this world’s pleasures i.e. becoming (bhava).

Krishna says – Arjuna, you are not the body but the embodied and so are all others (enacting or becoming these bodies), this embodied is nityam (continuum) therefore you should not grieve for felling of these bodies or anybody.

That’s all for today..

Shivoham!

-Acharya Agyaatadarshan Anand Nath

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Secret Alchemy of Sabar Mantras

Dear Master AD,

I came across an article in a book recently, in which it was written that Sabar Mantras are very powerful and they can be successfully perfected without much of effort. It was also said there that the keepers of these mantras are generally from the lower strata of society, who are neither devoutly religious nor much educated but still are able to put many Gods and Goddesses to their work and help others. It was described in that article how using these Sabar Mantras these mostly illiterate, unreligious, people living in unhygienic conditions, eating meat and drinking alcohol are able to treat sick people, cure them from spirits and possessions. It is surprising and kind of unbelievable because I see there are so many devout and pious religious people who don’t have such capacities.

I request you to please shed light on what are Sabar Mantras and how these Sabar Mantras work in the hands of these ordinary people and we, despite putting so much efforts in maintaining cleanliness, living a disciplined and moralistic life fail to acquire any such powers.

-Ameesh Halokane, Palghar, Maharashtra

Shivoham!

Beloved Ameesh,

Sabar Mantras fall in special category of mantras that were revealed by Lord Shiva especially for the ones who have no knowledge of ‘Language of Elite or Devas’ – the Sanskrit. Goswami Tulsidas in his epic ‘Ramacharita Manas’ which is dedicated to the Vishnu Avatar – Lord Shri Ram has briefly mentioned about the origin and power of these mantras. He says –

कलि बिलोकि जग हित हर गिरिजा। साबर मंत्र जाल जिन्ह सिरिजा॥
अनमिल आखर अरथ न जापू। प्रगट प्रभाउ महेस प्रतापू॥

Meaning “Upon seeing the arrival of Kaliyuga, lord Shiva along with his consort Parvati for the benefit of common people created this system of mantra known as ‘Saabar’. These mantras seemingly have no metre (rhythm), sometimes lack a definite meaning and don’t require elaborate ‘japa’ (repetition in certain numbers) to become effective instead these ‘sabar mantras’ are effective and potent due to special status being granted to these by Lord Shiva himself.”

Another important thing about mantras is that most of them are initially ‘keelit’ (rendered ineffective) and only when the practitioner ‘ignites’ their powers using the power of ‘sankalpa‘ (intention) and ‘japa‘ (ritualistic repetition) after ‘deeksha’ (getting initiated in the mantra) from a Guru (authority in imparting that mantra) but sabar mantras don’t require elaborate and prolonged ritualistic regimes. These are potent from the time of receiving itself. In fact sabar mantras are transmitted orally from Guru to Chela (disciple) and they become ‘keelit’ if they are written down. One more important fact about these mantras is that these have been resurrected again in the lineages of ‘Naths & Siddhas’ and therefore you will find many of these mantras with the phrase of ‘nau naath chauraasee siddhon ki duhaai’. Here ‘duhaai’ is a way of invoking and exciting the concerned deity (god, goddess or para-physical entity) to become active and come to help. Needless to say these mantras bring about results too quickly and you can easily use them to help & heal others as well.

Before I explain why these mantras are so potent I wish to ask you something. What gives you authority to call someone lowly, irreligious or not-so-pious? It ought to be your worldview rooted in archetype, where body-identification is somewhat primal obsession. All spiritual and meta-physical systems accept that ‘we’ are not the body and just think how can we be? Our presence and being is something ‘beyond’ and ‘separate’ from body. When we ‘leave’ this body – it becomes what it really is; Nothing but a dead matter. Investigating ‘Awastha-traya’ (wakefulness, dream and dreamless-sleep) will further give your more clarity about whether we are body or not. Also, if we take ourselves to be the ‘body’ then is this ‘physical body’ is the only body or we have some other bodies as well and which of them is more potent and of more value.

Physical body never comes in the way of experiencing your subtle and inner world nor it’s upkeep comes in the way of gaining control over the subtle world of energy, prana, nadis and tanmatras with which the bodies of so called intervening divine entities are made. If upkeep and surroundings in which this physical body is kept, could come in our inner-capacity developments – Aghoris could never gain any supernatural and paranormal powers! You need to spend a day in a cremation ground to see it yourself, how these Aghoris conduct themselves and how clean is their environment. Yet another recent spiritual personality as an example will further shake up your who firm belief in cleanliness and nobility. This medieval spiritual icon earned his livelihood from the business of making and mending shoes. Dealt in cooking and tanning leather, was unable to leave his job for a day to take a holy dip in the Ganges. Who was he? The revered saint Raidaas (Ravidas). There are so many miraculous stories about this divine, yet not so clean and pure saint. In fact we should ever refrain from taking a higher ground only because we have all the facilities and vasana to keep our physical bodies clean and dressed in an elite way – Your real purity is an inner phenomenon and it is best felt in your mind.

Further I would like to paraphrase your another objection. You say these people are illiterate and that in your opinion it makes them lesser human than us. It is covertly implied in this observation that inability of someone to read and write a language is a great impediment in one’s inner capacity development. My beloved friend, even if we look at the definition ‘Literacy is the ability to read, write, speak and listen in a way that lets us communicate effectively and make sense of the world‘.. Here the second part (underlined) of the definition is the supposed capacity outcome of the first but first is not mandatory in my personal opinion. History has seen many Masters who were unable to read or write a language but they communicated better than any erudite scholars of the subject they chose to speak and make sense of. Do you forget Kabir who declared –

मसि कागद छूयो नहीं, कलम गही नहिं हाथ।
चारिक जुग को महातम, मुखहिं जनाई बात।।

Meaning “I have not touched the paper and never held a pen in my hand however I am ready to explain you the secrets of all the four Yugas using only my ‘mukha’ (spoken words).

What to talk of being literate but even being a scholar of all the worldly subjects doesn’t help in understanding the mysterious ways our inner world operates. And the supernatural prowess of Kabir? He is one of those rare few who dissolved their bodies when leaving this physical plane. Frankly speaking being an intellectual is no guarantee of even intelligence forget divine intelligence which is the key to understand the secrets of the invisible world and its operating principles. To this effect Kabir himself says –

पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय |
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय ||

Meaning “People continue to read books, scriptures and philosophies but they don’t become wiser. The one who has become familiar with the language of heart is the only one who can be called ‘Wisest of all’.

Having dealt with your wrong assumptions now let me briefly speak on the question of ‘instant power’ and peculiar language of sabar mantras. Before proceeding I will tell you one secret. Although it is bit difficult to comprehend yet you should always keep in mind – ‘Gods, Goddesses, keepers and drivers of this universe are well within us, not outside but whatever you believe about them is equally true.’ Now, read further in the light of this statement. It will help you understand the alchemy of sabar mantras better.

The first reason is the quality of mind itself. You should understand that the system of education is based on questioning, doubting and it consists methods to strengthen and develop our faculty of logic. Yet in deepest of your mind you know the power arising out of our inner convictions, faith and trust is far superior than what ‘logic’ and questioning can bestow upon us. If logically you are convinced ‘I can not win over this situation’ there are almost zero possibilities you ever winning over it. It takes an undoubting mind to develop faith and it is the power of faith (not trust) that stirs up the cauldron of infinite possibilities and limitlessness – ‘our mind’. Your limitations are due to your so called ‘impure knowledge’. The great tantric text Shiva Sutra declared ‘ज्ञानं बन्धः’.. knowledge is bondage or limitation. Impure means the knowledge that employs only logic and structure to receive and accept anything – but doesn’t this existence exists and operates in ways that are beyond all our logic? For sure it does!

An innocent (uneducated or so called illiterate), raw mind in its nascent state, is fully endowed with the critical balance between both the qualities – Faith and Reason. This is the type of mind which is literally an ideal instrument and the source of power in itself. Such a mind ready to accept any concept that is presented to it. Be it existence of a deity and that this deity is endowed with humanlike emotions but superhumanly in its capabilities & powers. Such a mind does not ridicule any concept to that extent where it refuses to experiment and verify the associated experiences that are being claimed. Such a person will readily accept, let’s say presence of Hanuman (a half-monkey half-human God) and will enthusiastically take a plunge in ‘calling’ and invoking ‘Him’ in the deeper realms of his own psyche or in the place (be it a temple, peepal tree or a statue made in the stone) where he has been told that this ‘God’ lives. This innocent, unquestioning attitude gives rise to that unshakable holistic faith which is able to orient and channelize all the mental and pranic energies at command. Only such a mind is capable of moving mountains. Moving mountains is a phrase symbolic of the powerful miracles that such a mind can create.

To be able to appreciate the miracles created by the users of Sabar Mantras we must understand – ‘What is a miracle?’ and ‘What is role of the Mind in it?’

Prana is an active cosmic force that organizes the matter and gives it a structure. Prana at individual level moves, stabilizes and disrupts the pre-organized structures out there, including this physical body. Further Prana is influenced and moved by the ‘Power of mind’ and therefore in a sense we can say the power of mind is what moves, organizes and disrupts the movement of all the matters in our personal world. The natural flow of unmodulated prana, that is not influenced by mind, in this physical world is what we is considered to be ‘Normal’. Another ‘normal’ is that event in which prana is used in mobilizing, altering states/positions of matter while taking help of physical contact with other things and bodies. Miracle is roughly an event wherein so called ‘normal’ rules of working on prana & energy are seemingly defied which means – events, states of matter, organization or movement of matter is accomplished without an evident ’cause-effect’ explanation. However ‘miracle’ is a ‘Normal event’ using the (unknown) rules of ‘prana-mobilization’ belonging to the higher planes of existence. That is why it is sometimes called ‘para-Normal’. Mantras are the divine instruments of higher plane that are utilized by the mind (in specific states) to concentrate, modulate and direct the prana in most effective way. Sabar Mantras are no exception in this regard except in their readiness to exhibit their inherent capacities to direct prana and the attribute of ‘raw mind’ of the ‘user of the mantra‘.

While decoding the alchemy of miracles here we should not discount this critical factor that the users and very genre of ‘sabar mantras’ is such that it utilizes the power of heightened emotions to a greater degree. To show you how sabar mantras are worded to invoke heightened emotions let me give you an example. Have a look at this mantra below –

ॐ हनुमान पहलवान पहलवान, बरस बारह का जबान,
हाथ में लड्डू मुख में पान, खेल खेल गढ़ लंका के चौगान,
अंजनी का पूत, राम का दूत, छिन में कीलौ
नौ खंड का भूत, जाग जाग हड़मान
हुंकाला, ताती लोहा लंकाला, शीश जटा
डग डेरू उमर गाजे, वज्र की कोठड़ी ब्रज का ताला
आगे अर्जुन पीछे भीम, चोर नार चंपे
ने सींण, अजरा झरे भरया भरे, ई घट
पिंड की रक्षा करें कुंवर हड़मान
हनुमान हनुमान, बरस बारह का जबान,
जो न करे मेरो काम तो दुहाई अंजनी माई की
दुहाई गुरूजी की।

I am not sure if you know Hindi but frankly speaking this mantra can not be translated in any other language (forget a foreign language like English). However I can tell you that this sabar Hanuman mantra is like a personal conversation. This is a mix of prose and poetry, thus has no fixed metre. It is full of loud praise of the deity Hanuman but the mantrik (user of this mantra) is making a request in a way which is like pleading (as one is on one’s knees) emotionally and next moment he (user) is somewhat ‘threatening’ (though still full of reverence and cognizant of the divine powers this deity-friend hanuman has).

Any elite, educated person who comes to hear such a pleading will probably laugh at the way all this is being said – especially so because this all is directed to a higher power, God, a deity. A mind, that has become dried of raw emotion of friendship, is devoid of faith can never appreciate this way of calling, pleading and invoking a divine force.. but beloved Ameesh, it is this power of raw emotions which stirs up the etheric matter to create a giant whirlpool of prana which is then faithfully directed by an able ‘tranced’ mind to the desired outcome. This grand explosion of prana is possible as ‘trance’ is a state of meditation that we refer to as ‘dharana‘ in yogic/tantric terminology. Using trance one can transcend this plane of physical reality. The so called ‘normal’ of higher planes actually transcends the ’cause-effect paradigm’ of this lower plane..!

Emotional purity, a personal humanlike connect with deity is that peculiar element of sabar mantras. This human friendship with the divine forces is rarely experienced but wherever and whenever it gets ignited in a heart – any mantra will work. You can also try it but for that you will have to unlearn and decondition a lot and you will need a Guru.

Jai Ambe Shri!

-Acharya Agyaatadarshan Anand Nath

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