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The Gita: Srimad Bhagwadgita: श्रीमद्भगवद्गीता : Chapter 2:24

“चार्वाक दर्शन कहता है, ‘शरीर’ सुख भोगने का हेतु है – यावत् जीवेत सुखम् जीवेत ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत् | कृष्ण कह रहे हैं कि शरीर को मैं मान कर सुख और शान्ति की सिर्फ़ कल्पना ही हो सकती है – देहाभिमान से मुक्ति ही परम-उपाय है | ” – आचार्य अज्ञातदर्शन आनंद नाथ Continue reading

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