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शरीरमाद्यं खलु धर्म साधनम् !

“स्वच्छता के नियमों को सामजिक व्यवस्थाओं में झूठे अहंकार को पोषित करने के लिए उपयोग करना ही विज्ञान-घाती साबित हुआ और इन वैज्ञानिक स्वास्थ्य के नियमों के प्रति इतना रोष पैदा हुआ। आशा है अब बदले हुए वैज्ञानिक वातावरण में इस छुआछूत को वैघानिक व सामाजिक स्वीकृति मिलेगी और वह भी बिना कुंठाओं व मानसिक उत्पीड़न को जन्म दिए ही। ” – आचार्य अज्ञातदर्शन Continue reading

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